जहाँ से यात्रा आरंभ हुई
सराय हरखू के बच्चों ने दशहरे पर रामलीला और विजयादशमी मनाने का निश्चय किया। सीमित साधन थे, लेकिन उत्साह और श्रद्धा असीम थी।
9 दशकों से अधिक समय से चली आ रही आस्था, संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की गौरवशाली कहानी।
सराय हरखू के बच्चों ने दशहरे पर रामलीला और विजयादशमी मनाने का निश्चय किया। सीमित साधन थे, लेकिन उत्साह और श्रद्धा असीम थी।
स्व. श्री प्रेमनाथ श्रीवास्तव, स्व. श्री प्रकाशनाथ श्रीवास्तव और स्व. श्री जयंती प्रसाद श्रीवास्तव ने बाल आयोजन को दिशा, व्यवस्था और स्थायित्व दिया। उनके संकल्प ने धर्म मण्डल की नींव रखी।
ग्राम सराय हरखू, जनपद जौनपुर में श्री सीताराम धर्म मण्डल की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नौ दशकों से अधिक समय से चली आ रही आस्था, संस्कृति, पारिवारिक एकता और सामुदायिक सहभागिता की जीवंत परंपरा है।
उपलब्ध पारिवारिक एवं ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत सन् 1932 में कार्तिक एकादशी, बुधवार के दिन हुई। ग्राम के तीन युवा मित्र—स्व. प्रकाशनाथ, स्व. जयन्ती प्रसाद (बब्बू) एवं स्व. प्रेमनाथ (राजा)—ने ग्रामीणों एवं स्थानीय व्यापारियों के सहयोग से रामलीला एवं रावण दहन का आयोजन प्रारंभ किया। प्रारंभ में इन तीनों ने क्रमशः राम, लक्ष्मण और रावण के पात्रों का अभिनय किया। समय के साथ यह आयोजन विस्तृत होता गया और अनेक पात्र एवं ग्रामीण परिवार इससे जुड़ते चले गए।
इस गौरवशाली परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज स्व. श्री बेनी प्रसाद सिन्हा द्वारा संकलित एवं लिखित ‘आदर्श नाट्य माला’ है, जिसमें रामकथा एवं नाट्य परंपरा को साहित्यिक रूप प्रदान किया गया। यह कृति धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावशाली नाट्य-अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत करती है।
स्व. प्रेमनाथ जी (राजा) ने अपने जीवन में इस परंपरा को विशेष रूप से आगे बढ़ाया। युवा अवस्था में उन्होंने लक्ष्मण का पात्र निभाया। परशुराम-लक्ष्मण संवाद में उनके चाचा स्व. बिंद बासनी लाल जी द्वारा परशुराम की भूमिका निभाया जाना इस रामलीला की पारिवारिक एवं भावनात्मक विरासत का विशेष उदाहरण रहा।
इसी प्रकार लक्ष्मण शक्ति के मार्मिक प्रसंग में उनके पिता स्व. बासुदेव सहाय जी, जो स्वयं सुमंत की भूमिका निभाते थे, भावुक होकर मंचन बीच में छोड़कर घर लौट आते थे। ऐसे प्रसंग इस परंपरा में केवल अभिनय नहीं, बल्कि पात्रों और कथा के प्रति गहरी श्रद्धा एवं भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाते हैं।
वर्ष 1981 के स्वर्ण जयंती समारोह में स्व. प्रेमनाथ जी की स्वयं उपस्थिति इस संस्था के साथ उनके जीवनभर के जुड़ाव और समर्पण का प्रमाण रही।
आज भी श्री सीताराम धर्म मण्डल की रामलीला उसी श्रद्धा, आस्था, भक्ति और सामूहिक सहभागिता के साथ आगे बढ़ रही है। इस अवसर पर पूरा ग्राम भक्तिमय वातावरण में एक परिवार की तरह एकत्रित होता है और नई पीढ़ी अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित संस्कृति एवं परंपरा से जुड़ती है।
श्री सीताराम धर्म मण्डल की यह यात्रा केवल रामलीला के मंचन की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आस्था, संस्कार, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत की कहानी है।
नौ दशकों से अधिक की यह यात्रा हमारी आस्था की शक्ति, संस्कृति की निरंतरता और समाज की एकजुटता का प्रतीक है।
जय श्री राम।
श्री सीताराम धर्म मण्डल अमर रहे।
बुधवार के दिन बच्चों ने गाँव में घोषणा की कि अगले दिन विजयादशमी मनाई जाएगी। दुकानदार मैदान पहुँचे, बच्चों ने रामलीला प्रस्तुत की और रावण का पुतला दहन हुआ।
परिवारों और ग्रामवासियों ने बच्चों के प्रयास को अपनाया। चंदा, मंच, वेशभूषा, संवाद और आयोजन व्यवस्था क्रमशः विकसित होने लगी।
पुराने रामलीला निमंत्रण-पत्रों का संग्रह संस्था की बदलती प्रस्तुति, सदस्यों और सांस्कृतिक यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया।
पचास वर्षों की यात्रा का उत्सव विशिष्ट अतिथियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक सहभागिता के साथ मनाया गया।
साठ वर्ष पूर्ण होने पर विशाल जनसमूह, विविध कार्यक्रमों और विजयादशमी मेले के साथ गौरवशाली आयोजन हुआ।
पचहत्तर वर्षों की निरंतर सांस्कृतिक सेवा को भव्य समारोह में सम्मानित किया गया।
पाँच दिवसीय रामलीला और छठे दिन विजयादशमी मेला आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और श्रीराम के आदर्शों से जोड़ता है।